Thursday, 26 April 2018

वर्तमान की कमान संभालते जेंडर लीडर्स :-)


कुछ बातें...कुछ चीजें कभी समाप्त नहीं होती...क्योंकि आप का एक अंश...एक बीज...कुछ भावनाएं...थोड़े ख्याल वहां हमेशा के लिए बस जाते हैं...छूट जाते हैं
 
पानीपत के हाली अपना स्कूलमें साहस द्वारा आयोजित जेंडर, यौनिकता और प्रजनन स्वास्थ्य कार्यक्रम का समापन पहले आयोजित बाकी सभी कार्यक्रमों से बहुत अलग रहा। ऐसा इसलिए भी क्योंकि यहां पर काम करने का अनुभव और उससे जुड़ी भावनाएं बहुत अलग और आत्मीयता से ओत-प्रोत रही। 

इस सत्र की शुरुआत अलग अलग मुद्दों- पहचान, शारीरिक बदलाव, जेंडर, बाल यौन शोषण आदि पर हुई चर्चा और जानकारी को दोहराने और उसपर आधारित सवाल-जबाव से की गई। साहस के काम का एक अहम हिस्सा ये भी है कि जिन मुद्दों पर हमने जागरुकता और समझ बनाई है वो वन टाइम नहीं हो यानि ये बातचीत केवल हमारी कार्यशालाओं तक सीमित न रहें- इसलिए प्रतिभागियों की भागीदारी, उनके अनुभव और कैसे वो एक दूसरे का सहयोग करते हैं को ध्यान में रखते हुए 8 जेंडर दोस्त और लीडर का चुनाव किया और चार समूह बनाए गए। 




इसके बाद प्रतिभागियों को अपना जेंडर लीडर चुनने के लिए आमंत्रित किया गया और फिर सभी ने मिलकर अपने-अपने समूह को एक नाम दिया। अमूमन इस सत्र में प्रतिभागियों से मूल्यांकन फॉर्म भरवाया जाता है ताकि पता चल सके कि इन मुद्दों पर उनकी क्या समझ बनी है, लेकिन इस बार हमने उन्हें इन मुद्दों पर अपनी समझ को दर्शाने के लिए कुछ करने का निमंत्रण दिया- यानि कि वो चाहे तो कोई कविता, कहानी, लेटर, नाटक इत्यादि तरीका अपना सकते हैं।



ये एक्टिविटी कैसे जाएगी, इसका कोई अंदेशा नहीं था पर प्रतिभागी जिस तरह से तैयारी कर रहे थे वो काबिल-ए-तारीफ़ था मानो फाइनल एक्ज़ाम की तैयारी हो। सभी समूह स्कूल के अलग-अलग भाग में जा चुके थे, कुछ लिख रहे थे, कुछ बातें कर रहे थे, और हां ऐसा लगा कि वो नाटक प्रस्तुत करने वाले हैं।


तो हां अब समय आ गया था प्रस्तुतीकरण का। पहले समूह ने नुक्कड़ नाटक के जरिए बाल यौन शोषण की समस्या से रुबरु कराया- उन्होंने दिखाया कि एक परिवार का करीबी दोस्त 11 साल के बच्चे को गलत तरीके से छूने की कोशिश करता है, वो बच्चा डर जाता है लेकिन फिर हिम्मत करके अपने पिता से बात करता है। पिता के बात अनसुनी करने पर वो अपनी मां को बार बार बताता है जिसपर उसकी मां न केवल उसे समझती है पर दोषी आदमी के खिलाफ़ कार्रवाई भी करवाती है। इस नाटक के आखिर में उन्होंने बाल यौन शोषण से जुड़ी जानकारी भी दी।



दूसरे समूह ने महावारी पर आधारित नाटक प्रस्तुत किया जहां दिखाया गया कि पहली बार पीरियड्स होने पर एक छात्रा घबरा जाती है, घर पहुंचने पर वो समझ नहीं पाती है कि क्या करें? ऐसे में उसकी मां महावारी से जुड़ी पूरी जानकारी उसे देती है और उसे प्यार करती है। वहीं जब उसके पिता उसे अपवित्र कहते हैं, किचन में और पूजा घर में जाने से मना करते हैं तो भी उसकी मां अपने पति का विरोध करती है और उन्हें समझाती है।


तीसरा नाटक महावारी और उससे जुड़ी मिथक बातों पर आधारित रहा- इस नाटक में दिखाया गया कि कैसे एक लड़की के महावारी होने पर उसके दोस्त उसके साथ खेलने से मना कर देते हैं। गांववाले लोग उसे अलग रहने को कहते हैं, उससे किसी को मिलने नहीं थे, अपवित्र कहते हैं और दुर्व्यहार करते हैं। लेकिन वहीं एक किशोर जिसने स्कूल में महावारी पर आधारित क्लास अटेंड की थी, वो गांववालों और बच्चों से बात करता है और समझाता है कि महावारी एक शारीरिक बदलाव है और इसमें पवित्र और अपवित्र कुछ नहीं होता।



चौथा और आखिरी नाटक सबसे अहम और बेहद मनोरंजक रहा – यहां प्रतिभागियों ने पहले दिखाया कि कुछ लड़के एक लड़की को बार बार छेड़ते हैं वो काफी परेशान रहती है। एक दिन जब वो लड़के किशोरी को छेड़ते हैं तो बाजार जा रही महिला उन लड़कों को डांटती है और पुलिस में शिकायत भी करती है। दूसरे सीन में उन्होंने दिखाया कि उनके स्कूल में शारीरिक बदलाव और यौन शिक्षा पर आधारित अलग अलग क्लास आयोजित की जा रही है।


इस नाटक की कई अहम बातें रही – मसलन उन्होंने दिखाया कि कैसे एक महिला छेड़खानी रोकने के लिए मदद करती है नाकि एक पुरुष। वो दिखाना चाहते थे कि महिला और पुरुष दोनों ही ताकतवर होते हैं और बहुत जरुरी है कि महिलाएं भी हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाए। दूसरे सीन में टीचर (जो एक समूह की जेंडर लीडर भी है) ने बेहतरीन तरीके से शारीरिक बदलाव, बाल यौन शोषण, महावारी और सेक्स को समझाया, इसके साथ ही छात्रों ने बड़े अच्छे सवाल पूछे।

और इन सभी प्रस्तुति को देखकर मेरे मन ने एक अलग तरह की शांति का अनुभव किया, विचार आया कि अब समय हो गया है यहां से अलविदा कहने का क्योंकि अब जिनके हाथ में जानकारी की कमान है वो पूरी तरह तैयार हो चुके हैं।  
             

Wednesday, 25 April 2018

बाल यौन शोषण को चुनौती देने के लिए तैयार किशोर-किशोरियां :-)


साहस के जेंडर, यौनिकता और प्रजनन स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत सबसे अहम सत्र बाल यौन शोषण पर आधारित होता है। जेंडर आधारित हिंसा का सबसे पहला और सबसे भयानक रुप बाल यौन शोषण होता है, ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चों को पता ही नहीं होता कि वो इस हिंसा के लिए नहीं बोल सकते हैं, उन्हें समझ में नहीं आता कि उनके साथ हो क्या रहा है?  हमारे शरीर और समाज की भ्रांतियों, टेढ़ी मेढ़ी प्रथाएं किशोर-किशोरियों को और असमंजस में डाल देती है। इसी के मद्देनजर बाल यौन शोषण पर समझ बनाने से पहले हम शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों पर बातचीत करते हैं, इस जानकारी के साथ साथ हम प्रतिभागियों के लिए सुरक्षित जगह बनाते हैं ताकि वो बिना किसी झिझक, डर या शर्म के अपनी बातें, सवाल, कहानियां, कन्फूयजन बांट पाएं।

बाल यौन शोषण पर आधारित सत्र की शुरुआत भेड़ और भेड़िए के खेल से की गई जहां लड़के और लड़कियों ने खुलकर भाग लिया, और बड़ी ही फुर्ती से अपने आप को भेड़िए के चक्रव्यू से निकाला। 

ये सत्र काफी गहन, संवेदनशील और जरुरी होता है इसलिए कार्यशाला शुरु करने से पहले हमने एक बार फिर वर्कशॉप को सुरक्षित जगह बनाने के लिए नियम दोहराए। इसके बाद चाइल्ड लाइन की फिल्म कोमल के जरिए सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श को समझा।



बाल यौन शोषण को और गहराई और उससे जुड़ी भावनाओं को समझने के लिए हमने चित्रों से लैस प्रेसेन्टेशन दिखाई। इसके साथ ही किशोर-किशोरियों को पॉस्टो एक्ट के अहम बिंदूओं की भी जानकारी दी गई।


सत्र के अगले पड़ाव में प्रतिभागियों को उनके साथ हुए या कभी उन्होंने बाल यौन शोषण होते हुए देखा हो, को सांझा करने के लिए आमंत्रित किया। इस दौरान एक बार फिर उन्हें सुरक्षित महसूस कराने और गोपनीयता के नियम का पालन करने के लिए कहा गया। 


मेरे साथ तो ऐसा नहीं हुआ है लेकिन मैंने एक आदमी को जो व्हील चेयर पर आता है, बच्चों को टॉफी देकर अपने पास बुलाते हुए देखा है। मुझे वो ठीक नहीं लगा।

ये कहते ही 5-6 किशोर-किशोरियों ने हामी भरी और बताया कि उन्होंने भी उस शख्स को देखा है। एक और प्रतिभागी ने बताया, “एक दिन जब मम्मी-पापा काम के लिए बाहर गए थे तो मैंने देखा कि एक आदमी कॉलोनी के बहुत सारे बच्चों के साथ देखा, वो मोबाइल में कुछ गंदी वीडियो दिखा रहा था। मैंने बाद में इस बारे में अपने माता-पिता को बताया तो उन्होंने मुझे ऐसे किसी भी शख्स से दूर रहने के लिए कहा


बाल यौन शोषण को चुनौती देने के लिए प्रतिभागियों को एक सेफ्टी एक्शन प्लान भरने के लिए आमंत्रित किया गया। ये एक अनूठा तरीका है ताकि जेंडर आधारित हिंसा से लड़ने के लिए उनकी क्षमता बनाई जा सके। इस वर्कबुक में वो कैसे इस परिस्थिति से बच सकते हैं, अगर कोई शख्स उन्हें छूने की कोशिश करे तो वो कैसे रिएक्ट करें, किस शख्स से मदद मांगे- विश्वसानीय शख्स कौन होता है इत्यादि के बारे में कहानियों के जरिए चर्चा की गई है। 



सत्र के आखिरी पड़ाव में प्रतिभागियों को इस मुद्दे से संबंधित सवालों को पूछने का मौका दिया गया। रोचक बात ये थी कि लड़के और लड़कियां दोनों में आत्मविश्वास की झलक दिख रही थी, जो कह रही थी कि वो ऐसे किसी भी घटना से निपटने के लिए तैयार हैं। कार्यशाला की समाप्ति पर हमने स्कूल के संस्थापक और प्रिंसिपल से व्यहीलर चैयर वाले शख्स के बारे में बात की, और उन्हें भी इस बारे में जागरुक किया ताकि अगर कोई ऐसी अनचाही घटना घटे तो वो उससे निपटने के लिए तैयार रहे।                

Tuesday, 24 April 2018

जेंडर के ढांचे को चुनौती देते 'हाली अपना स्कूल' के किशोर-किशोरियां


तुम लड़के हो इसलिए सीना तान कर चलो
 

तुम लड़की हो तो सिर झुकाकर नज़रे नीचे करके चलो

किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक बदलावों के साथ साथ किशोर-किशोरियों को समाजिक बदलावों से भी रुबरु होना पड़ता है। और इस बदलाव का असर उनके ज़हन पर सबसे ज्यादा असर करता है, ऐसा इसलिए क्योंकि असमंजस और सवालों से भरी इस उम्र में उन्हें क्या करना चाहिए, कैसे रहना चाहिए, कैसे नहीं से, साथ ही जेंडर और यौनिकता को लेकर पहले से बनाए ढांचों में फिट करने की कोशिश और तेज हो जाती है। इससे पहले वो कुछ समझ पाए समाज की अनदेखी और अनसुनी मजबूत बेड़ियां उन्हें जकड़ने के लिए पूरे जोर से तैयारी कर लेती है। ऐसे में किशोरावस्था में ही जेंडर और जेंडर आधारित भेदभाव की समझ बनाना और जरुरी हो जाता है।

पानीपत के हाली अपना स्कूल के विद्यार्थियों के साथ पांचवा सत्र जेंडर: लड़का, लड़की होने के क्या मायने हैं?” पर आधारित रहा। एक मज़ेदार उलटा पुलटा खेल के साथ सत्र की शुरुआत की गई।



पहली एक्टिविटी चिट गेम में प्रतिभागियों को एक एक पर्ची बांटी गई जिसमें अलग-अलग काम, रोजगार, ज़िम्मेदारियां इत्यादि लिखी गई। इसके पहले भाग में प्रतिभागियों को पर्ची में लिखी बात के मुताबिक ये फैसला करना था कि ज्यादातर ये काम लड़के करते हैं या लड़कियां और उसी हिसाब से दो अलग अलग लाइनें बनाने के लिए कहा गया। एक्टिविटी के दूसरे चरण में एक बार फिर उन्हें पर्ची पर लिखे काम के मुताबिक तीन लाइनें बनानी थी- एक जो सिर्फ लड़के कर सकते हैं, दूसरी जो सिर्फ लड़कियां कर सकती हैं और तीसरी जो लड़का और लड़की दोनों कर सकते हैं। लाइनें बनाने के बाद प्रतिभागियों को उस पर्ची में लिखे कार्य को पढ़कर ये बताना था कि वो इस लाइन में क्यों खड़े हैं। एक्टिविटी में चर्चा करते करते- लड़कों की लाइन एकदम खाली हो गई, लड़की की लाइन में केवल गर्भवती होना रह गया और तीसरी लाइन में सभी प्रतिभागी आ गए। जिसके बाद सभी प्रतिभागी हैरान रह गए और अचरच की हंसी हसने लगे।




चिट गेम के बाद प्रतिभागियों को 6 अलग अलग समूह में बांटा गया और उनसे उनके लड़का होने या लड़की होने की वजह से मिले संदेश सांझा करने को कहा गया- 


लड़के होने की वजह से मिले संदेश-

लड़कों को लड़कियों की तरह नहीं रोना चाहिए

अगर लड़के धीमी आवाज़ में बोले, या उनकी आवाज़ पतली होती है, तो उन्हें बुलंद आवाज़ में बोलने को कहा जाता है

लड़कियों के साथ खेलने को मना किया जाता है

लड़कियों के जैसे खड़े मत हो, लड़कियों के साथ हंसी मज़ाक मत करो

लड़कियों की तरह मत चला करो, लड़कियों की तरह मत शर्माओ, लड़कियों की तरह बात मत किया करो

जैसे की हम लड़के हैं तो हम लड़कियों के कपड़े जैसे स्कॉर्ट, सूट सलवार नहीं पहन सकते

लड़कियों के जैसे बाल नहीं रखना चाहिए

लड़कियों के साथ नहीं घूमना चाहिए

बड़ी बहन कहती है कि भाई तू लड़कियों की तरह मत रोया कर

लड़कियों की तरह घबराया मत करो

लड़के हो तो ऊंची आवाज़ में बात किया करो, लड़कों के साथ ही खेला करो

मुझे घर में काम करने के लिए मना किया जाता है



लड़कियों को मिले संदेश-

लड़कों के जैसे कपड़े निकर, पैंट टी शर्ट नहीं पहनना चाहिए

लड़कों के साथ मत खेला करो, लड़कों के खेल जैसे क्रिकेट मत खेलो

लड़की होतो सूट सलवार पहनो, चुन्नी लो

जैसे ही हम इस उम्र में आते हैं तो घर के काम करने पड़ते हैं, और हमें स्कूल जाने से भी रोका जाता है

हमें बाहर घूमने से मना किया जाता है, लड़कों से बात करने के लिए मना किया जाता है

लड़कियों को लम्बे बाल रखने चाहिए

रात या शाम को बाहर मत जाओ, देर तक मत खेलो, लड़कों की तरह ऊंची आवाज़ में बात मत करो

जब ये संदेश प्रतिभागी पढ़ रहे थे तो मेरे सीने में चुभन हो रही थी, ऐसा लग रहा था कि लड़की होना कोई बहुत बुरा अभिशाप है, एक गाली जैसा लग रहा था, कि कैसे लड़कों को बार बार लड़कियों जैसे ये मत करो, वो मत करो कहा गया जैसे वो काम बहुत गिरा हुआ है। वहीं लड़कियों पर हर तरह की पाबंदी लगाई जा रही है। ऐसे में जब कोई शख्स कहता है कि हमारा समाज बदल रहा है, अब जेंडर आधारित फर्क उतना दिखता नहीं तो मुझे उसकी अक्ल और सोच दोनों पर हंसी आती है क्योंकि यहां 12-14 साल की बच्चे अपने आप को जेंडर के दायरे में बंधा पा रहे हैं और समाज अपने ही बबल में खुश है। तो हां अभी बहुत फर्क हैं और बहुत काम करना है ताकि इस मानसिकता को जड़ से निकाल फेंका जाए।



इसके बाद कानाफूसी के खेल और जेंडर की कहानी के जरिए जेंडर क्या है, क्यों है, इसका हमारे जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है और हम इसे चुनौती दे सकते हैं पर समझ बनाई और इसपर विस्तार से चर्चा की गई।


सत्र के अगले और आखिरी भाग में प्रतिभागियों को 4 समूहों में बांटा गया, हर समूह को एक स्थान मसलन घर, स्कूल, दोस्तों के साथ और सार्वजनिक जगह दी गई और उन्हें यहां जेंडर फर्क को पहचानने और समझने के लिए आमंत्रित किया गया।


समूह की चर्चाओं के कुछ अहम बिंदू निम्नलिखित हैं-

घर-

मम्मी खाना बनाती है, अगर वो बीमार हो तो भी उन्हें ही खाना बनाना पड़ता है, या फिर बहन खाना पकाती है। घर का काम जैसे साफ-सफाई, कपड़े धोना, घर की देखभाल, बुजुर्गों की देखभाल भी मां ही करती है  

पापा नौकरी करते हैं, घर का सारा खर्च वो ही देते हैं। घर में कोई चीज कम हो, खत्म हो जाए या फिर कुछ और तो भी पापा ही बाज़ार जाते हैं


स्कूल-

स्कूल में लड़के और लड़कियां अलग अलग बैठते हैं

लड़के और लड़कियों के खेल भी अलग अलग होते हैं

गलती करने पर लड़के और लड़कियों को अलग अलग सज़ा दी जाती है

जब भी स्कूल में कोई काम जैसे कुर्सी उठाना, भागदौड़ का काम करना तो उसके लिए हमेशा लड़कों को बुलाया जाता है

स्कूल में कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम होता है तो लड़कियों को बुलाया जाता है। कार्यक्रम के कामों में भी लड़के और लड़कियों का फर्क होता है


दोस्तों के साथ-

लड़कियां बैडमिंटन, खोखो, छुप्पन छुपाई जैसे खेल खेलते हैं। हम अपने ग्रुप में लड़कों के बारे में भी बातें करते हैं जैसे वो लड़का कितना काला है, वो मुझे पसंद नहीं है, ये लड़का स्मार्ट है और ये मुझे पसंद है

लड़के क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल जैसे खेल खेलते हैं। लड़के भी अपने ग्रुप में लड़कियों के बारे में बात करते हैं।

असल में देखा जाए तो लड़के और लड़कियों की बातचीत और सोच काफी हद तक एक जैसी होती है। पर उनके रहनसहन, खेलकूद और आचार विचार में समय के साथ फर्क आ जाता है


सार्वजनिक जगह-

ज्यादातर बाज़ार, सब्जी मंडी में लड़कियां नहीं दिखती क्योंकि उनके परिवारवाले उन्हें बाहर नहीं जाने देते

पार्क में भी ज्यादातर लड़के ही खेलते नज़र आते हैं क्योंकि लड़कियों को बाहर नहीं खेलने दिया जाता

दुकानों पर लड़कियों को नहीं बैठने दिया जाता है क्योंकि सभी को लगता है कि अगर लड़की दुकान पर बैठेगी तो दुकान पर लड़के ज्यादा आएंगे, सामान खरीदने कम पर लड़की को देखने ज्यादा

सड़क पर लड़के ही ज्यादा होते हैं, लड़कियों को घर से बाहर निकलने ज्यादा नहीं दिया जाता क्योंकि अगर वो ज्यादा बाहर जाएंगी तो लड़के उन्हें छेड़ेंगे

बस स्टैंड पर, बसों में, कार भी लड़के ही चलाते हैं । क्योंकि अगर एक लड़की बस चलाती है तो बुजुर्ग कहते हैं कि ये काम लड़कों का है और लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए

कंचों का खेल और कई खेलों को खेलने से लड़कियों को ये कहकर रोक दिया जाता है कि ये सभी खेल लड़कों के हैं और लड़कियों को ये सब नहीं करना चाहिए  


जेंडर और जेंडर आधारित फर्क पर हुई ये चर्चा काफी आंखे खोलने वाली रही, क्योंकि अबतक हमने 100 से ज्यादा किशोर-किशोरियों के साथ ये सत्र किया है लेकिन यहां जो बाते सांझा की गई वो बहुत गहन थी, काफी सोचने वाली और झकझोरने वाली। राहत सिर्फ इस बात की है कि अब इन किशोर-किशोरियों को पता है कि उनका लड़का होना या लड़की होना उनके सपनों, आकंशाओं, या उनकी ताकत का फैसला नहीं कर सकता, उन्हें इस सामाजिक ढांचे की जानकारी हो गई है और प्रतिभागियों की बात से ये साफ है कि वो इस झूठे ढांचे को चुनौती देने के लिए तैयार हैं